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Sunday, 5 April 2026

कितनी बातें...

कितनी बातें...

 हममें तुममें रह जाती हैं कितनी बातें
चश्म-ए-नम भी कह जाती हैं कितनी बातें

सब्र की पाबंदी तो नाज़िल है जुबां पे,
ख़ामोशी में ढह जाती हैं कितनी बातें

ढलते सूरज की राहों में आते ही, फिर..
साए बन कर रह जाती हैं कितनी बातें

उनका लहज़ा जैसे समंदर-सा गहरा
बन के साहिल सह जाती हैं कितनी बातें

ज़र्द-सा मौसम जब भी राहों से गुज़रा
पत्तों जैसी बह जाती हैं कितनी बातें

चंदना सोमाणी ©

कितनी बातें...

कितनी बातें...  हममें तुममें रह जाती हैं कितनी बातें चश्म-ए-नम भी कह जाती हैं कितनी बातें सब्र की पाबंदी तो नाज़िल है जुबां पे, ख़ामोशी में ...