मानो या ना मानो...
हर तरफ़ है ज़िक्र तुम्हारा तुम मानो या ना मानो
कहता है वो टूटता तारा तुम मानो या ना मानो
बचपन के दिन फिर से जीने की ख्वाहिश है लेकिन
ला-हासिल हैं पल दोबारा तुम मानो या ना मानो
मंज़िल की धुन में रह कर हम तो मंज़र देख न पाए,
खोया है हर एक नज़ारा तुम मानो या ना मानो
स्टेटस और स्टोरी में ही, अब तो सिमट गई है दुनिया
उसी में उलझा है जग सारा तुम मानो या ना मानो
वो जो इक नन्हा-सा परिंदा, रहता था उस डाली पर,
फिरता है बेघर-बेचारा, तुम मानो या ना मानो
बाहर से तो सारी बस्ती खुशहाली मे डूबी है
अंदर ग़म का है गलियारा, तुम मानो या ना मानो
चंदना सोमाणी ©®

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