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Saturday, 17 August 2024

चार ओळी - १४


 तुळशीकडे पाहिलं 
मंजिरी होती फुललेली 
सुखी संसाराची साक्ष जणू 
अंगणी माझ्या बहरलेली 

चंदना सोमाणी ©®

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