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Sunday, 5 April 2026

कितनी बातें...

कितनी बातें...

 हममें तुममें रह जाती हैं कितनी बातें
चश्म-ए-नम भी कह जाती हैं कितनी बातें

सब्र की पाबंदी तो नाज़िल है जुबां पे,
ख़ामोशी में ढह जाती हैं कितनी बातें

ढलते सूरज की राहों में आते ही, फिर..
साए बन कर रह जाती हैं कितनी बातें

उनका लहज़ा जैसे समंदर-सा गहरा
बन के साहिल सह जाती हैं कितनी बातें

ज़र्द-सा मौसम जब भी राहों से गुज़रा
पत्तों जैसी बह जाती हैं कितनी बातें

चंदना सोमाणी ©

Sunday, 29 March 2026

मानो या ना मानो...

मानो या ना मानो...

 हर तरफ़ है ज़िक्र तुम्हारा तुम मानो या ना मानो
कहता है वो टूटता तारा तुम मानो या ना मानो

बचपन के दिन फिर से जीने की ख्वाहिश है लेकिन
ला-हासिल हैं पल दोबारा तुम मानो या ना मानो

मंज़िल की धुन में रह कर हम तो मंज़र देख न पाए,
खोया है हर एक नज़ारा तुम मानो या ना मानो

स्टेटस और स्टोरी में ही, अब तो सिमट गई है दुनिया
उसी में उलझा है जग सारा तुम मानो या ना मानो

वो जो इक नन्हा-सा परिंदा, रहता था उस डाली पर,
फिरता है बेघर-बेचारा, तुम मानो या ना मानो

बाहर से तो सारी बस्ती खुशहाली मे डूबी है
अंदर ग़म का है गलियारा, तुम मानो या ना मानो

चंदना सोमाणी ©®

Monday, 9 March 2026

तेरी आँखो मे...

        तेरी आँखो मे...      

उतर आई है यह कैसी शरारत तेरी आँखों में
मोहब्बत है या फिर कोई बग़ावत तेरी आँखों में

झुकी पलकें कि जैसे सजदा ठहरा हो दुआओं में
कि जैसे देखते हैं हम इबादत तेरी आँखों में

हमारी गुफ़्तगू को एक पल में रोक देती है
बड़ी संजीदा लगती है शराफ़त तेरी आँखों में

ज़माने की जफ़ाओं से मुझे अब ख़ौफ़ क्या होगा
वफ़ा के साथ घुलती है ये चाहत तेरी आँखों में

हज़ारों ख़्वाब बिखरे हैं सितारों की तरह लेकिन
कहाँ से ढूँढ लाएँ फिर से क़िस्मत तेरी आँखों में

नहीं अब और हसरत शायरी से अपनी दुनिया में
ग़ज़ल को मिल गई है अपनी राहत तेरी आँखों में

चंदना सोमाणी ©

Tuesday, 24 February 2026

मराठी गझल - होत गेला

गझल - होत गेला 


निष्पर्ण होत गेला 
तो कर्ण होत गेला 

सांडून रंग सारे 
निर्वर्ण होत गेला 

हा बाण वेदनांचा 
आकर्ण होत गेला 

प्रत्येक शब्द माझा 
संवर्ण होत गेला 

जाळून देह सारा
उत्पर्ण होत गेला 

चंदना सोमाणी ©®

Sunday, 22 February 2026

मराठी गझल - दुःख माझे

गझल - दुःख माझे

तुला कळलेच नाही दुःख माझे
जरी हे बारमाही दुःख माझे

फुलांशी वैर नव्हते फारसे पण..
तरी सलतेच काही दुःख माझे

पुन्हा भेटू नको म्हणणेच नाही
असो आता प्रवाही दुःख माझे

सलोखा ठेवला होता सुखाशी 
पुढे देणार ग्वाही दुःख माझे

तसे तर दुःख निवडू की तुला मी
अरे ही वेदनाही दुःख माझे

कधी ना संपणारा हा दुरावा
तरीही बादशाही दुःख माझे

तुला पाहून हे कळते मलाही
किती छळते तुलाही दुःख माझे

चंदना सोमाणी ©®

Saturday, 21 February 2026

मराठी गझल - जखम उर्मिलेची

गझल - जखम उर्मिलेची

का आत आत माझ्या अंधार कोसळे
हा सूर्य कोणता जो माझ्या सवे जळे

ठेवीन दिमकतीला मी शेकडो झरे
देईल काय धोका राखील जो तळे

नजरेसही दिसेना शोधू तरी कुठे
ही जखम उर्मिलेची आतून साकळे

हा प्रश्न पावसाला पडलाच शेवटी
अश्रू तरी कुणाचे सर्वात वेगळे

मी जोजवू कसे या दुःखास पोरक्या
पाहून दुःख माझे काळोख तळमळे

कोणीतरी उगीचच हा वाद घातला
भरणार ना कधीही शेतातले खळे

अदृश्य होत गेली ही अक्षरे कशी
लिहिले जरी कितीही कोरेच हे फळे

चंदना सोमाणी ©®

Friday, 6 February 2026

मराठी गझल - कैकदा

गझल - कैकदा 

अनुभवली मी ओल कैकदा 
इतकी गेले खोल कैकदा

विरून जाते फिरून येते 
काळासोबत गोल कैकदा

सोडत त्याचा जुना अबोला 
चाफा म्हणतो बोल कैकदा

उरले नाही मागे काही 
उरण्याला ना मोल कैकदा 

सावरताही आले नाही 
तसाच गेला तोल कैकदा

भासवून मग खऱ्यासारखा 
खोटा ठरतो रोल कैकदा

अपवादाला कारण पुरते 
वादच ठरतो फोल कैकदा

चंदना सोमाणी ©®

कितनी बातें...

कितनी बातें...  हममें तुममें रह जाती हैं कितनी बातें चश्म-ए-नम भी कह जाती हैं कितनी बातें सब्र की पाबंदी तो नाज़िल है जुबां पे, ख़ामोशी में ...